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अफगानिस्तान के तालिबानी फरमानों का भारत पर भी पड़ने लगा असर ?

अफगानिस्तान में तालिबान ने कब्जा किया और शरिया क़ानून के नियमों को जबरन लागू करना शुरू कर दिया. रोज नए-नए फरमान जारी होने लगे, तमाम तरह की बंदिशें लगाई जाने लगीं. महिलाओं के गीत-संगीत पर पाबंदी लगी, महिलाओं के आवाज वाले प्रसारणों पर रोक लगा, मिडिया से महिलाओं को निकाल-बाहर किया गया. छात्र-छात्राओं को एक साथ पढने यानी को-एजुकेशन को भी शरिया कानून के तहत निशाना बनाया गया, शिक्षा के इस सिस्टम पर हमला किया गया.

वैसे एक बात ये भी गौर करने की है कि अफगानिस्तान में तालिबान के हावी होते ही, भारत में तालिबानी सोच के समर्थकों ने सिर उठाना शुरू कर दिया है. तालिबान का असर भारत में भी तालिबानी सोच रखने वाले कुछ लोगों पर दिखाई देने लगा है. यही वजह है कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद (JUH) के अध्यक्ष अरशद मदनी ने सभी मुसलमानों से अपनी बेटियों को अश्लीलता से बचाने के लिए सह-शिक्षा यानी को-एजुकेशन वाले स्कूलों में नहीं भेजने की अपील की है. उन्होंने लड़कियों को उनके लिए बने अलग स्कूलों में ही भेजने पर जोर दिया.

इस बीच जमीयत उलेमा के महासचिव, गुलजार आजमी ने को-एजुकेशन को लेकर विवादित बयान दिया है. गुलजार आजमी ने कहा कि वह भारत के संविधान से ज्यादा इस्लाम को मानते हैं. गुलजार आजमी यहीं नहीं रुके, उन्होंने को-एजुकेशन को लेकर कहा कि हमारा मतलब है कि जो आज बदमाशी हो रही है, इसलिए लड़के-लड़की अलग-अलग पढ़ें क्योंकि जो चीज जितनी कीमती होती है, उसकी उतनी हिफाजत की जाती है. उन्होंने कहा कि हम तालिबान को नहीं जानते हैं, हम तो इस्लाम को जानते हैं. हम जो भी बात करते हैं वो संविधान के तहत करते हैं. गुलजार आजमी ने अपनी बात को बल देते हुए कहा कि हमने संविधान के तहत बात की है. उन्होंने कहा कि हम इस्लाम को मानते हैं, इस्लाम जो कहेगा उसे हम मानेंगे. उन्होंने कहा कि आर्टिकल 25-30 के तहत मुसलमान अपने कुरान को माने उसके अनुसार चले. जो इस्लाम को ना माने, मुसलमान नहीं.

आपको बता दें कि जेयूएच की कार्यसमिति की बैठक के बाद सोमवार को जारी एक प्रेस बयान में मदनी ने कहा था कि अनैतिकता और अश्लीलता किसी धर्म की शिक्षा नहीं है. दुनिया के हर धर्म में इसकी निंदा की गई है क्योंकि यही चीजें हैं जो देश में दुर्व्यवहार फैलाती हैं. इसलिए, हम अपने गैर-मुस्लिम भाइयों से भी कहेंगे कि वे अपनी बेटियों को अनैतिकत दुर्व्यवहार से दूर रखने के लिए को-एजुकेशन देने से परहेज करें, उनके लिए अलग शिक्षण संस्थान स्थापित करें.

सवाल ये है कि मदनी हों या आज़मी हों, या फिर इनके जैसे ही सोच वाले अन्य लोग हों, क्या ये लोग इस बात का जवाब देंगे कि अगर वो शरिया क़ानून के प्रति इतने ही जिम्मेवार, संवेदनशील और शरई-परस्त हैं तो क्या वो किसी मुस्लिम धर्म के अपराधी के लिए भारतीय कानून के बदले शरिया कानून के तहत दंड-प्रणाली को लागू करने के पक्षधर हैं ? इस बात का जवाब देने से पहले उन्हें ये सोचना होगा कि भारतीय कानून, मानवाधिकार से सन्निहित है जबकि शरिया कानून के तहत अपराधी को अपराध के मुताबिक़ दंड देने का प्रावधान है, जो “खून के बदले खून” की सजा की पैरोकारी करता है.

भारत सरकार को चाहिए की भारत में तालिबानी सोच को बढ़ावा देने वाले लोगों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करे वरना इस देश में अगर तालिबानी सोच के बीज बहुतायत में प्रस्फुटित होते हुए दिखे, तो वो दिन दूर नहीं जब इस देश में शरिया कानून को लागू करने का दबाव सरकार पर पड़ता हुआ दिखेगा. जिस दिन ऐसा हुआ, उसी दिन से विकास का दावा फेल हो जायेगा और देश में शरिया कानून के तहत बर्बरता कायम होती हुयी दिखने लगेगी.

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