Home>>Breaking News>>तालिबान को मोहरा बनाकर, ISIS-K के सफाए का प्लान बनाएगा अमेरिका, काँटा से निकालेगा काँटा
Breaking Newsताज़ादुनियाराष्ट्रिय

तालिबान को मोहरा बनाकर, ISIS-K के सफाए का प्लान बनाएगा अमेरिका, काँटा से निकालेगा काँटा

अगर देखा जाए तो अपने फायदे के लिए तालिबान को पैदा करने वाला अमेरिका ही है और अपने ही पैदाईश से हार कर, अफगानिस्तान से बेआबरू होकर अपने वतन लौट जाने वाला भी अमेरिका ही है. अगर चीन अपने विस्तार के लिए साजिशें और कूटनीति को रचता-संवारता है तो अमेरिका को दुनिया में अपने डिक्टेटरशिप को काबिज करने का नशा है. अफगानिस्तान को तालिबान के हाथों में सौंपने वाला अमेरिका अब अपनी नई साजिश को अंजाम देने की कवायद करता हुआ दिख रह है.

अफगानिस्तान में तालिबान राज आने और अमेरिका के चले जाने से अगर आतंकी संगठन आईएस-खुरासान (ISIS-K) यह सोच रहा है कि उसके अच्छे दिन आए गए हैं, तो यह उसकी एक बड़ी भूल होगी. अगर अमेरिकी राष्ट्रपति के हालिया बयानों की मानें तो अमेरिका भले ही अफगानिस्तान को छोड़ चुका है, मगर वह आतंकियों के खिलाफ अपना अभियान जारी रखेगा. इस बार अमेरिका पहले से और ताकतवर होकर आईएस-खुरासान पर वार करेगा और इसमें उसकी मदद तालिबान कर सकता है. पेंटागन के टॉप अधिकारियों की मानें तो अमेरिका अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत यानी आईएस-के (ISIS-K) से लड़ने के लिए तालिबान के साथ सहयोग पर विचार कर रहा है.

“यूएस न्यूज” के मुताबिक, पेंटागन के टॉप अधिकारी ने बुधवार को कहा कि अमेरिकी सेना अफगानिस्तान में आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट खुरासान को हराने के लिए तालिबान के साथ समन्वय करने पर विचार कर रही है. कल बुधवार को संवाददाता सम्मेलन के दौरान ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष सेना के जनरल मार्क मिली से आतंकवाद विरोधी प्रयास के लिए तालिबान के साथ सेना के हाथ मिलाने को लेकर पूछा गया तो उनका जवाब था कि यह संभव है. 

ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष आर्मी जनरल मार्क मिली ने कहा कि यह संभव है कि इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों या अन्य के खिलाफ अफगानिस्तान में भविष्य में किसी भी आतंकवाद विरोधी हमले के लिए अमेरिका को तालिबान के साथ समन्वय करना होगा. हालांकि, उन्होंने कहा कि तालिबान एक ‘क्रूर’ संगठन है और वे बदलते हैं या नहीं यह देखा जाना बाकी है. उन्होंने आगे कहा कि युद्ध में आप वह करते हैं जो आपको मिशन और फोर्स के जोखिम को कम करने के लिए करना चाहिए.

अफगानिस्तान से 124,000 से अधिक अमेरिकी नागरिकों, अफगानों और अन्य लोगों को निकालने के दो दिन बाद मिली और रक्षा सचिव लॉयड ऑस्टिन ने पेंटागन के संवाददाताओं से कहा कि फिलहाल, अफगानिस्तान में तालिबान के भविष्य की भविष्यवाणी करना मुश्किल है.

वैसे अगर देखा जाए तो अमेरिकी अधिकारियों का आकलन है कि तालिबान और आईएसआईएस-के कम से कम अफगानिस्तान में एक दूसरे के दुश्मन नहीं तो प्रतिद्वंद्वी जरूर हैं. ऐसे में तालिबान का इस्तेमाल अमेरिका आईएस-के के खिलाफ कर सकता है.

अमेरिका, अपने दुश्मनों के खात्मे के लिए तालिबान से हाथ मिला सकता है, इसकी प्रबलल संभावना भी इसलिए है, क्योंकि बीते दिनों यूएस सेंट्रल कमांड के प्रमुख मरीन जनरल फ्रैंक मैकेंजी ने अफगानिस्तान से निकासी प्रक्रिया के दौरान तालिबान के साथ अमेरिकी संबंधों को बहुत व्यावहारिक और बहुत ही व्यवसायिक बताया था. उन्होंने कहा कि तालिबान ने एयरपोर्ट को सुरक्षित करने में अमेरिका की मदद की. बीते दिनों जब अमेरिका का निकासी अभियान जारी था, तभी काबुल एयरपोर्ट पर आईएस-खुरासान के आतंकी ने हमला कर दिया था, जिसमें अमेरिका के 13 जवान मारे गए थे.

हालांकि, काबुल हमले के 48 घंटे के भीतर ही अमेरिका ने अफगानिस्तान के नानगरहार प्रांत में आईएसआईएस-के को निशाना बनाकर एयरस्ट्राइक किया था और काबुल ब्लास्ट के दो साजिशकर्ताओं को मार गिराया था. काबुल हमले के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा था कि अमेरिका अपने दुश्मनों को ढूंढकर भी मारेगा और काबुल हमले का बदला लेगा. बता दें कि 31 अगस्त को अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपना बोरिया-बिस्तर बांध लिया और अब अफगानिस्तान में पूरी तरह से तालिबान का कब्जा है.

अमेरिका के द्वारा तालिबान नाम के कांटे से ISIS-K नाम का कांटा निकलाने का जो जुगत निकाला है, भारत के लिए उसके कई फायदे साबित हो सकते हैं. एक तो ये कि तालिबान और पाकिस्तान के अलावा सभी आतंकी संगठनों को यह सनद रहेगी कि आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका ने जंग लड़ना बंद नहीं किया है, बस उसका तौर-तरीका बदल दिया है. अगर ISIS-K की बात करें तो अन्य आतंकी संगठनों की तरह यह संगठन भी भारत को अपने निशाने पर लिए बैठा है. भारत में “गजवा-ए-हिन्द” की मुहीम के लिए इसके स्लीपर सेल भी भारत में मौजूद हैं और सोशल मिडिया के मार्फत यह संगठन भारतीय युवा मुसलमानों को बरगलाने के प्रयास में लगा रहता है.

वैसे अफगानिस्तान में किसी भी तौर-तरीके से सही, किसी भी रूप में सही, अमेरिका की उपस्थिति भारत के लिए जरुरी है ताकि उस खाली जमीन पर पाकिस्तान, चीन और रूस का वर्चस्व कायम न हो सके. अमेरिका का यह नया तिकड़म क्या रंग लाएगा, कब से अपनी उपस्थिति दिखाता हुआ नजर आएगा. ये देखने वाली बातो होगी.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *