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GRAND SALE का बोर्ड लगाकर सरकारी संपत्तियों की बिकवाली करना चाहती हैं निर्मला सीतारमण, लेकिन कहाँ हैं खरीदार ?

केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने GRAND SALE का बोर्ड लगाकर सरकारी संपत्तियों के बिकवाली का प्लान तो बना लिया. विपक्ष का बवेला भी मोदी-सरकार के ऊपर मढ़ दिया और मोदी-सरकार पर सियासी हमले का मौका भी विपक्ष को दे दिया. लेकिन इस बिकवाली की सबसे बड़ी समस्या ये है कि खरीदार ही नहीं मिल रहे. मतलब की “हो-हंगामा पच्चीसी, काम हुआ ढेला”

पिछले साल अगस्त में नीलाम किए गए 109 रेल यात्री मार्गों में से किसी को भी बेचने में सरकार की विफलता शर्मनाक ही कही जायेगी. कई बोलीदाताओं ने 35 वर्षों तक यात्री सेवाओं को चलाने के अधिकारों में रुचि दिखाई और सरकार ने नीलामी से 30,000 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद भी लगाई. लेकिन अंततः बोलीदाता पीछे हट गए. उन्होंने हवाला दिया कि नियम नेशनल ट्रांसपोर्टर के पक्ष में हैं, एक सच्चे स्वतंत्र नियामक की कमी है, रूट फ्लेक्सिबिलिटी पर अंकुश है और कुछ दूसरे अनसुलझे मुद्दे भी हैं, जिसके कारण खरीदारी में पेंच है.

अगर देखा जाए तो खरीद-बिक्री का ये खेल, मुझे 2018-19 में एयर इंडिया के निजीकरण के लिए कोई बोली प्राप्त करने में विफलता की याद दिलाता है. यह ज्यादा कठिन मामला था क्योंकि इसमें भारी एक्युमुलेटेड लॉस (Accumulated Loss) था, लेकिन फिर भी कुछ खरीदारों ने रुचि दिखाई तो थी ही. सामान्य तौर पर, मंत्रालय सभी प्रकार की शर्तों को जोड़ना चाहते हैं और समान अवसर बनाने के खिलाफ हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह प्राइवेट ऑपरेटर्स को, सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिद्वंद्वियों का हक मारने में सक्षम कर सकता है. दूसरी बात ये भी है कि प्रत्येक मंत्रालय अपने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिए खुद को चैंपियन समझता है. जबकि सच्चाई ये है कि प्राइवेट बोलीदाता सही मायने में मंत्रालयों के निष्पक्ष होने पर भरोसा नहीं करते हैं या फिर इस बात को लेकर भरोसा नहीं करते हैं कि एक सच्चा स्वतंत्र नियामक नियुक्त होगा.

मोदी सरकार ने हाल ही में नेशनल मॉनेटाइजेशन पाइपलाइन की घोषणा की है. इसमें सरकार ब्राउनफील्ड इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राइवेट पार्टीज को लीज पर देगी. इससे अगले 4 सालों में 6 लाख करोड़ रुपये जुटाने का प्लान है. एनएमपी, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश में वृद्धि को फाइनेंस करके जीडीपी के 10 फीसदी तक ले जाएगा, भारत को वर्ल्ड क्लास बनने के लिए इसकी बेहद ज्यादा जरूरत है. इस साल के लिए एनएमपी के तहत लक्ष्य 0.9 ट्रिलियन रुपये का है. 2023-24 में यह 1.9 लाख करोड़ और 2024-25 में 1.7 लाख करोड़ रुपये का है.

अगर देखा जाए तो सरकारी संपत्तियों को लीज पर देने का आइडिया नया नहीं है और न ही इसे मोदी-सरकार के द्वारा लिया गया पहला फैसला ही कहा जा सकता है. इससे पहले भी कई टोल रोड्स के मामले में ऐसा किया जा चुका है. लेकिन पहले और अब में अंतर ये है कि इस बार एसेट्स की वाइड रेंज को लीज पर दिया जा रहा है. अमेरिका और चीन जैसे दूसरे देश भी इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़ा खर्च करने की सोच रहे हैं, लेकिन वे मुख्यतया सरकारी उधारी से फाइनेंस ही होंगे. लेकिन भारत ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि कोविड की वजह से सरकारी कर्ज/जीडीपी रेशियो बढ़कर लगभग 90 फीसदी हो चुका है. टार्गेट रेशियो 60 फीसदी है यानी आने वाले सालों में सरकार को अपनी उधारी पर कड़ा नियंत्रण रखना होगा. ऐसे में एनएमपी फंडिंग ही एकमात्र वैकल्पिक रास्ता है.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि केंद्र सरकार तो सरकारी एसेट्स की GRAND SALE लगाए बैठी है, लेकिन क्या इच्छुक खरीदार हैं ? इस सवाल का जवाब,  रेलवे ऑक्शन की हकीकत बयां करती है. भारत में कई संभावित खरीदार हैं. अगर वे राजनीतिक सिस्टम पर भरोसा करें कि उन्हें उचित लेवल प्लेइंग फील्ड मिलेगा और टेक्नोलॉजिकल या क्लाइमेट चेंज जैसी अप्रत्याशित घटनाओं के मामले में उचित व्यवहार होगा, तो वे बोली लगाने में रुचि जरूर लेंगे, लेकिन यह विश्वास आज की तारीख में मौजूद नहीं है.

ऐसे में सवाल ये भी है कि जब खरीदार नहीं मिल रहे, तो सरकार के पास अगली प्लानिंग क्या है ? सरकार को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप्स पर केलकर कमेटी के सुझावों को लागू करना चाहिए. इन सुझावों में इंफ्रास्ट्रक्चर पीपीपी प्रॉजेक्ट रिव्यू कमेटी का सुझाव भी शामिल है, जो कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों में उचित बदलाव कर सकती है, वह भी भ्रष्टाचार को रोना रोए बिना. केलकर कमेटी का यह सुझाव भी है कि विवादों को सुलझाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर पीपीपी एडज्यूडिकेशन ट्रिब्यूनल को अस्तित्व में लाया जाए.

इस उलझन के बिच, सरकार को चाहिए की वो भारतीय टेलिकॉम सेक्टर की गड़बड़ी को याद करे, जब 1990 के दशक में टेलिकॉम नीलामी जीतने वाले बिडर्स ने पाया कि उन्होंने मांग को अधिक आंक लिया था. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी में नए रेवेन्यू शेयरिंग टैरिफ मॉडल को क्रिएट करने का साहस था और उन्होंने मौजूदा टेलिकॉम कंपनियों को इस मॉडल में माइग्रेट होने की अनुमति दी. जबकि इसका अर्थ प्राइवेट कंपनियों पर मेहरबान होना और क्रोनिज्म की बात उठना था. अगर एनएमपी सफल होता है तो ऐसी फ्लेक्सिबिलिटी जरूरी होगी.

अगर देखा जाए तो नवंबर 2019 में सरकार ने घोषणा की थी कि वह तीन बड़ी कंपनियों भारत पेट्रोलियम एंड केमिकल्स लिमिटेड, शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया और कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचेगी. ऐसा लगा कि अब प्राइवेटाइजेशन का डर खत्म हो चला है और प्रक्रिया शुरू होगी. लेकिन दो साल पूरे होने वाले हैं और तीनों कंपनियों में से एक की भी बिक्री नहीं हुई है. सरकार का दावा है कि कोविड ने अर्थव्यवस्था में अवरोध पैदा किया और बिक्री को मुश्किल बना दिया. लेकिन कोविड के झटके के बावजूद स्टॉक मार्केट में गुजरे 2020 में बूम आना शुरू हुआ और आज सेंसेक्स व निफ्टी अपने रिकॉर्ड हाई पर हैं. इसका कारण है कि घरेलू और विदेशी निवेशकों ने अरबों रुपये मार्केट में लगाए हैं. पब्लिक सेक्टर कंपनियों के शेयरों की कीमत भी बढ़ी है.

वैसे ये सच है कि प्राइवेटाइजेशन के लिए अच्छी बोलियां प्राप्त करने को लेकर वातावरण बेहतर नहीं हो सका है. इसलिए तीनों कंपनियों की बिक्री में देरी, मंत्रालयों में प्रक्रिया से जुड़ी कमियों का खुलासा करती है. इससे साफ़ संकेत मिलता है कि कमियों को दूर करने और पूरी प्रक्रिया को मैनेज करने के लिए एक बड़े सुधार की जरूरत है, नहीं तो 6 एनएमपी से 4 सालों में 6 लाख करोड़ रुपये जुटाने का सपना, सपना ही रह जाएगा.

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