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आर्थिक तबाही के कगार पर श्रीलंका, चीन की मदद पर टिका, भारत के लिए बढ़ा एक और खतरा

भारत के लिए उसके पड़ोसी देशों की आर्थिक कमजोरी, अब भू-विस्तारवादी चीन के लिए सुनहरा मौका और भारत के लिए खतरा बनती हुई नजर आ रही है. अभी अफगानिस्तान में तालिबानी कब्जे से भारत की स्थिति अनिर्णायक बनी हुयी थी, अब इधर श्रीलंका में आर्थिक तबाही की आशंकाओं से भारत के लिए खतरा बढ़ता हुआ दिखने लगा है.

चीन के कर्ज की जाल में फंसा श्रीलंका अब गंभीर आर्थिक संकट और भुखमरी का सामना करने जा रहा है. यही कारण है कि श्रीलंकाई सरकार को पिछले हफ्ते देश में आर्थिक आपातकाल का ऐलान करना पड़ा. खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों, मुद्रा में गिरावट और तेजी से घटते विदेशी मुद्रा भंडार ने श्रीलंका की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है. हालात यहां तक बिगड़ गए हैं कि राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को विभिन्न आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई के लिए सेना को बुलाना पड़ा है.

श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार 2019 में 7.5 बिलियन डॉलर से गिरकर इस साल जुलाई में लगभग 2.8 बिलियन डॉलर हो गया है. विदेशी मुद्रा की कमी के बाद श्रीलंकाई लोगों को विदेशों से माल आयात करने के लिए ज्यादा मात्रा में पैसों का भुगतान करना पड़ रहा है. इसलिए अब तक श्रीलंकाई रुपये के मूल्य में लगभग 8 फीसदी तक की गिरावट आ चुकी है. श्रीलंका में खाद्य पदार्थों का आयात बड़ी मात्रा में किया जाता है, ऐसे में रुपये में आई गिरावट के कारण खाद्य पदार्थों की कीमत में तेजी देखी जा रही है.

श्रीलंका के आर्थिक संकट में फंसने के कई कारण बताए जा रहे हैं. इनमें चीन का कर्ज, पर्यटन उद्योग, नकदी खाद्यान के उत्पादन में कमी जैसे कई कारण शामिल हैं. श्रीलंका के सकल घरेलू उत्पाद में पर्यटन उद्योग की हिस्सेदारी 10 फीसदी से ज्यादा है. कोरोना महामारी और ट्रैवल बैन के कारण श्रीलंकाई पर्यटन उद्योग की कमर टूट गई है. तमाम तरह के प्रतिबंधों को हाल में हटाने के बावजूद काफी कम संख्या में पर्यटक श्रीलंका का रूख कर रहे हैं.

श्रीलंका की महिंदा राजपक्षे सरकार ने खेती में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया हुआ है. ऐसे में कृषि उत्पादन के कम होने से खाद्यान संकट के और ज्यादा गहराने के आसार दिखाई दे रहे हैं. इस साल की शुरुआत में राजपक्षे ने श्रीलंका को 100% जैविक कृषि क्षेत्र वाला दुनिया का पहला देश बनाने की अपनी योजना को सार्वजनिक किया था. श्रीलंका के चाय विशेषज्ञ हरमन गुणरत्ने जैसे कई लोगों का मानना है कि जैविक खेती की ओर जबरन जोर देने से चाय और अन्य फसलों का उत्पादन आधा हो सकता है.

श्रीलंका की सरकार इस आर्थिक संकट का ठीकरा आवश्यक आपूर्ति की जमाखोरी करने वाले सट्टेबाजों पर फोड़ा है. सरकार का आरोप है कि इनके जमाखोरी के कारण ही देश में खाद्य कीमतों में वृद्धि हो रही है. इसी कारण उन्हें सार्वजनिक सुरक्षा अध्यादेश के तहत आर्थिक आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी है. ऐसे में श्रीलंकाई सेना को व्यापारियों से खाद्य आपूर्ति जब्त करने और उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर आपूर्ति करने का काम सौंपा गया है. यह भी सुनिश्चित करने की शक्ति दी गई है कि विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग केवल आवश्यक वस्तुओं की खरीद के लिए किया जाए.

सरकार ने पूर्ण जैविक खेती के लिए अपने आक्रामक प्रयास को समाप्त करने से इनकार करते हुए दावा किया है कि जैविक खेती के अल्पकालिक दर्द की भरपाई इसके दीर्घकालिक लाभों से की जाएगी. इसने किसानों को एक विकल्प के रूप में जैविक उर्वरकों की आपूर्ति करने का भी वादा किया है. इसके अलावा, श्रीलंका के केंद्रीय बैंक ने इस साल की शुरुआत में व्यापारियों को एक अमेरिकी डॉलर के लिए 200 से अधिक श्रीलंकाई रुपये का आदान-प्रदान करने से रोक दिया है.

श्रीलंका पर दुनियाभर के देशों का कुल 55 अरब डॉलर का कर्ज है. रिपोर्ट के अनुसार, यह धनराशि श्रीलंका की कुल जीडीपी की 80 फीसदी है. इसमें सबसे अधिक कर्ज चीन और और एशियन डिवेलपमेंट बैंक का है. जबकि इसके बाद जापान और विश्व बैंक का स्थान है. भारत ने श्रीलंका की जीडीपी का 2 फीसदी कर्ज दिया है.

श्रीलंका ने जून के मध्य में कोरोना वायरस से निपटने के लिए चीनी निर्मित फेस मास्क और चिकित्सा उपकरण का एक और खेप प्राप्त किया है. जो इस बात का सबूत है कि श्रीलंका बीजिंग की विदेश नीति और डोनेशन डिप्लोमेसी का महत्वपूर्ण हिस्सा है. आर्थिक कर्ज से श्रीलंका को बेदम करने के बाद चीन खुद ही वायरस को फैलाकर अब उसका इलाज कर रहा है.

चीन की इंडो पैसिफिक एक्सपेंशन और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) में चीन ने श्रीलंका को भी शामिल किया है. श्रीलंका ने चीन का कर्ज न चुका पाने के कारण हंबनटोटा बंदरगाह चीन की मर्चेंट पोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड कंपनी को 1.12 अरब डॉलर में साल 2017 में 99 साल के लिए लीज पर दे दिया था. हालांकि अब श्रीलंका इस पोर्ट को वापस चाहता है.

महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में श्रीलंका और चीन के बीच नजदीकियां खूब बढ़ी. श्रीलंका ने विकास के नाम पर चीन से खूब कर्ज लिया. लेकिन, जब उसे चुकाने की बारी आई तो श्रीलंका के पास कुछ भी नहीं बचा. जिसके बाद हंबनटोटा पोर्ट और 15,000 एकड़ जगह एक इंडस्ट्रियल जोन के लिए चीन को सौंपना पड़ा. अब आशंका जताई जा रही है कि हिंद महासागर में अपनी गतिविधियों को जारी रखने के लिए चीन इसे बतौर नेवल बेस भी प्रयोग कर सकता है.

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