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कुछ युवा बेरोजगारी के लिए लगाते हैं नारे लेकिन सासाराम स्टेशन पर लिखी जाती है सफलता की कहानी

बिहार में एक रेलवे स्टेशन है सासाराम, यह स्टेशन साधारण सा है, इसमें लोकप्रियता या विख्यात होने जैसा कुछ ख़ास नहीं. लेकिन यह स्टेशन देश के बेरोजगारों के लिए प्रेरणा और आदर्श के रूप में लोकप्रिय और विख्यात जरुर हो चूका है.

बात लगभग वर्ष 2002 या 2003 की है जब सासाराम स्टेशन पर सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले कुछेक प्रतियोगी रात में आते थे क्योंकि घर में बिजली की आवाजाही रहती थी और पढाई में दिक्कत होती थी. सासाराम रेलवे स्टेशन पर बिजली लगातार रहती थी तो इन प्रतियोगियों को परीक्षा की तैयारी करने में सहूलियत होती थी. बाद में इनके देखा-देखी और भी प्रतियोगियों ने स्टेशन पर जुटान शुरू कर दिया. चूँकि इस स्टेशन पर बहुतायत ट्रेन की आवाजाही नहीं थी, इसलिए स्टेशन प्रबंधन के द्वारा इन प्रतियोगियों को पढने-लिखने देने में भी कोई आपत्ति नहीं थी. इन्हें स्टेशन के एक ऐसे प्लेटफ़ॉर्म पर बैठने की अनुमति दे दी गयी थी, जहां बहुत कम ही ट्रेन की आवाजाही होती थी. प्लेटफ़ॉर्म के एक कोने में अलग-अलग बिजली के खम्भों के निचे ये प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते और सुबह अपने घर चले जाते. खुले में इन्हें गर्मी का भी एहसास नहीं होता था. बरसात या ठंड के दिनों में स्टेशन का शेड इन्हें राहत देता था. कड़ी मेहनत ने रंग दिखाया और कई प्रतियोगियों ने सरकारी नौकरी पाकर अपनी मेहनत को सफल किया. कई तो रेलवे में ही नौकरी पाए. सासाराम स्टेशन के स्टेशन मास्टर को जब उन्होंने अपने सफलता की मिठाई के साथ सम्मान प्रकट किया तो स्थानीय स्टेशन मास्टर ने भी इनके मेहनत को सलाम किया. पहले जो कुछ पाबंदियां थीं, उसमें कुछ राहत मिली.

शुरूआती दौर में सासाराम स्टेशन पर तैयारी करने वाले कई बेरोजगार युवाओं ने सरकार में अच्छे पदों पर नौकरी प्राप्त की. कुछ UPSC में सेलेक्ट हुए तो कुछ बिहार या अन्य राज्यों में प्रशासनिक सेवाओं में भी नियुक्त हुए. बहुतों ने रेलवे विभाग, बैंक या अन्य सरकारी विभागों में नौकरी प्राप्त की. धीरे-धीरे सासाराम स्टेशन पर प्रतियोगिता की तैयारी करने वाले इन प्रतियोगियों के बारे में अखबार या जनश्रुतियों के माध्यम से अन्य युवाओं को जानकारी मिली तो वो भी इस स्टेशन का रुख करने लगे. प्रतियोगिता के लिए केवल तैयारी ही नहीं बल्कि बेहतर तैयारी के लिए माहौल की जरूरत होती है, जो उन्हें यहाँ बेहतर तौर पर मिलता हुआ दिख रहा था.

यहाँ तैयारी करने वाले वो युवा जो सरकार में नौकरी प्राप्त कर चुके थे. उनलोगों ने भी इन लोगों के सफलता के लिए नए तरीके ढूंढे, उन्होंने समय-समय पर टेस्ट की व्यवस्था करना शुरू कर दिया. वो उस दौर में जब मोबाइल का प्रचलन कम था. डाक के माध्यम से या इंटरनेट के माध्यम से क्वेश्चन पेपर तैयार कर के भेजते और ये युवा प्रतियोगी उसे हल करते. बाद में उसे आंसर शीट से मिलाते और अपनी खामियों को सुधारने का प्रयास करते.

धीरे-धीरे सासाराम स्टेशन पर जब ऐसे प्रतियोगियों की भीड़ बढ़ी तो रेलवे प्रबंधन ने ऐसे प्रतियोगियों को पहचान-पत्र जारी करना शुरू कर दिया ताकि स्टेशन पर आवाजाही में ऐसे युवाओं को परेशानी न हो. इनमें से कई ऐसे भी प्रतियोगी थे जो सासाराम के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के थे, वो चौबीसों घंटे स्टेशन पर ही रहते थे. स्टेशन का वो प्लेटफार्म, जहां ट्रेन की बहुत कम आवाजाही रहती थी, उसी के एक क्षेत्र में ऐसे प्रतियोगिओं ने अपना ठिकाना बना लिया था.

आज की स्थिति ये है कि सासाराम स्टेशन देश का एक ऐसा स्टेशन बन चूका है जहां बेरोजगार युवा, बेरोजगारी के नाम पर अपनी छाती नहीं पिटते, सरकार के खिलाफ नारेबाजी नहीं करते बल्कि मजबूती के साथ सरकारी नौकरी पाने के लिए तैयारी करते हैं और इनमें से कई सफल भी होते हैं. सच कहा जाए तो बिहार का सासाराम स्टेशन, ऐसे युवाओं के लिए कर्म-क्षेत्र बना हुआ है और उनकी सफलता में रेलवे विभाग का बड़ा ही महत्वपूर्ण योगदान है.

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