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यूपी की जनता हमेशा मुस्लिम पार्टियों को बैरंग लौटाते रही है …. क्या ओवैशी भी लौटेंगे बैरंग ?

यूपी में मुस्लिम धर्म पर राजनीति करने वालों के लिए 14 फरवरी सबसे बड़ा दिन था। दूसरे चरण में उन 55 विधानसभा सीटों पर वोटिंग पूरी हो गई, जहां 40% से ज्यादा मुसलमान वोटर हैं। यहां, मुस्लिम पार्टी होने का दावा करने वाली AIMIM ने 15 मुस्लिम कैंडिडेट उतारे हैं, लेकिन AIMIM प्रत्याशी अभी से निराश दिख रहे हैं। दरअसल, ये आज की बात नहीं है। आजादी के बाद से अभी तक यूपी में कोई मुस्लिम पार्टी टिक ही नहीं पाई है। आइए आपको उन टॉप 6 मुस्लिम पार्टियों से मिलाते हैं जिन्होंने एड़ी-चोटी की जान लगा दी, पर यूपी में सफल नहीं हो पाईं।

1. यूपी की पहली मुस्लिम पार्टी को 4000 वोट भी नहीं मिले :

मुस्लिम मजलिस पार्टी : डॉ.अब्दुल जलील फरीदी आजादी की लड़ाई में थे। आजादी के बाद वे नेता बने। उनकी रैलियों में मुसलमानों की भीड़ तो खूब उमड़ती थी। वे चाहते थे कि यूपी की राजनीति में उन्हें बड़ा पद मिले, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। आखिरकार 20 साल बाद 1968 में मुस्लिम मजलिस नाम की पार्टी बनाई। मकसद बताया, ‘मुस्लिम अल्पसंख्यक बिरादरी को उनका हक दिलवाना।’

पार्टी बनने के एक साल बाद यानी 1969 में यूपी में विधानसभा चुनाव हुए। मुस्लिम मजलिस पार्टी ने दो सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों ही सीटों पर पार्टी की जमानत जब्त हो गई। दोनों सीटों पर मिलाकर मुस्लिम मजलिस पार्टी को 4000 से भी कम वोट मिले। साल 1974 में डॉ. फरीदी की मौत के साथ ये पार्टी भी खत्म होती गई।

2. यूपी की दूसरी मुस्लिम पार्टी 33 साल तक चुनाव लड़ती रही, 1 सीट ही जीती

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग : यूपी के विधानसभा 1974 सिर पर थे। प्रदेश में कोई मुस्लिम पार्टी चर्चा में नहीं थी। पहले मुस्लिमों की अगुआई का खम भरने वाले डॉ. फरीदी भी नहीं रहे थे। तब गुलाम महमूद बनातवाला बतौर मुस्लिम नेता पॉपुलर होने लगे। उन्होंने इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को रीचार्ज किया।

विधानसभा चुनाव 1974 में मुस्लिम लीग ने 54 सीटों पर कैंडिडेट उतारे थे, लेकिन 43 की जमानत जब्त हो गई। सिर्फ एक सीट ही जीत पाई। सिर्फ जमानत ही बचा पाए थे। लिस्ट में नीचे से दूसरे या तीसरे नंबर थे।इसके बाद ये पार्टी सन्नाटे में चली गई। फिर 28 साल बाद गुलाम महमूद ने फिर दम भरा। विधानसभा चुनाव 2002 में उन्होंने 18 सीटों पर कैंडिडेट उतारे, लेकिन जीता कोई नहीं। रही-सही कसर साल 2007 के विधानसभा चुनाव ने पूरी कर दी। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का 33 साल पहले 54 सीटों से शुरू हुआ सफर 2 सीटों पर चुनाव लड़ने तक सिमट गया। यूपी की जनता ने उन्हें इतने पर भी नहीं छोड़ा। ये दोनों सीटें हारे और फिर कभी यूपी में नहीं उतरे।

3. यूपी की तीसरी मुस्लिम पार्टी, मायावती से बदला लेने के लिए बनी थी, पर ले नहीं पाई

नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी : साल 1995 में भाजपा के समर्थन में बसपा की सरकार बनी। ये वह दौर था जब यूपी के मुसलमानों का बसपा पर विश्वास बढ़ा हुआ था। मायावती यूपी की सीएम बनाई गईं। उन्होंने डॉ. मसूद अहमद को शिक्षा मंत्री बनाया।
डॉ. मसूद ने शिक्षामंत्री रहते हुए अल्पसंख्यक समुदाय के लिए काफी काम किया। लेकिन कुछ समय बाद मायावती ने डॉ. मसूद को कैबिनेट से बर्खास्त कर दिया। मायावती से अपनी बेइज्जती का बदला लेने के लिए डॉ. मसूद ने साल 2002 में नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी यानी नेलोपा बनाई।

नेलोपा विधानसभा चुनाव 2002 में 130 सीटों पर चुनाव लड़ा। खुद को मुस्लिमों की पार्टी होने का दावा करने वाली नेलोपा के 130 कैंडिडेट्स में से 126 की जमानत जब्त हो गई। पार्टी को सिर्फ एक सीट पर जीत मिली। इसलिए 2007 के विधानसभा चुनाव में डॉ. मसूद की पार्टी ने केवल 10 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन नतीजा 2002 से भी बुरा हुआ। इस बार पार्टी के 100% कैंडिडेट्स की जमानत जब्त हो गई। इसके बाद डॉ. मसूद रालोद से जुड़ गए।

4. यूपी की चौथी मुस्लिम पार्टी, जामा मस्जिद के इमाम की भी नहीं चली

यूपी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट :
2007 के विधानसभा चुनाव में दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी ने भी किस्मत आजमाई। उन्होंने 54 सीटों पर यूपी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के प्रत्याशी उतारे। उन्हें लगता था कि दिल्ली में मुसलमानों का बड़ा वर्ग उन्हें सपोर्ट करता है। वो जिस पार्टी को कहते थे, मुसलमान उसी को वोट देते थे, लेकिन यूपी के वोटरों ने इस बात को गलत साबित कर दिया।

विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो यूपी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के 54 में से सिर्फ एक उम्मीदवार जीता, जबकि 51 सीटों पर जमानत जब्त हो गई। इस शर्मनाक हार के बाद अहमद बुखारी यूपी की सियासत से गायब हो गए।

5. यूपी की पांचवी मुस्लिम पार्टी ने गांव-गांव जाकर मुसलमानों के मुद्दे जाने, पर रिजल्ट निराश कर गया

पीस पार्टी : साल 2008 में नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के उपाध्यक्ष रहे डॉ. अय्यूब सर्जन ने पीस पार्टी बनाई। पीस पार्टी ने चार साल तक पार्टी ने जमीन पर उतरकर प्रचार किया। मुसलमानों के असल मुद्दे समझे। 2012 के विधानसभा चुनाव में पीस पार्टी ने 208 सीटों में से सिर्फ 4 जीतीं। यह पार्टी की उम्मीद से बहुत कम थीं, लेकिन कुछ नहीं से बेहतर थीं। 2017 में पीस पार्टी ने एक बार फिर चुनाव मैदान में उतरी, लेकिन इस बार उसका खाता तक नहीं खुल पाया।

6. यूपी की छठी मुस्लिम पार्टी के दावे बड़े-बड़े, लेकिन खाता नहीं खुला

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ( AIMIM ) : साल 1926 में बनी पार्टी देश की राजनीति में 2019 में चमकी। AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने भाजपा और कांग्रेस को चुनौती देने के लिए 2019 लोकसभा चुनाव में पार्टी को उतारा था। हैदराबाद में AIMIM ने अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन दूसरे राज्यों में पार्टी की हालत खराब रही। AIMIM ने साल 2017 में यूपी में 38 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन कहीं भी जीत नसीब नहीं हो सकी। सभी कैंडिडेट्स की जमानत जब्त हो गई थी।

यूपी विधानसभा चुनाव-2022 में औवेसी नई तैयारी से आए हैं। उन्होंने 403 सीटों में से 100 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। पार्टी अब तक 76 विधानसभा सीटों पर कैंडिडेट एनाउंस कर चुकी है। इसने 61 मुस्लिम उम्मीदवार हैं और 15 हिंदू, अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी और दलितों वर्ग के लोगों को टिकट दिया है।

पहले दो चरणों में वोटिंग के बाद ओवैसी के तेवर ढीले पड़ते दिख रही है। उन्होंने इस बार बाबू सिंह कुशवाहा की जन अधिकार पार्टी और भारत मुक्ति मोर्चा के साथ गठबंधन भी किया है, लेकिन 10 मार्च को इस बात से बर्ता उठेगा कि ओवैसी इतिहास बदल देंगे या यूपी में सफल न होने वाली मुस्लिम पार्टियों की लिस्ट और लंबी कर देंगे।

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