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इंडिया की ‘पैड वुमन’ अंजू बिष्ट को मिला ‘वुमन ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया अवार्ड’, केले के रेशे से बनाती हैं पैड

केले का उपयोग कई तरह से होता है. इसके फल को पौष्टिक खाद्य के रूप में, फल के छिलके को सौंदर्य प्रसाधन के रूप में, केले के तने को पशुओं को चारे के रूप में खिलाने के रूप में, केले के फुल को सब्जी के रूप में उपयोग किया जाता है. यूपी के कुशीनगर में तो केले के रेशे से विभिन्न तरह के डेकोरेटिव आइटम बनाए जाते हैं. इसके रेशे से दरी-जाजिम इत्यादि का निर्माण होता है. यूपी सरकार ने तो ODOP (One District One Product) के तहत कुशीनगर को केले के रेशे से बनाए जाने वाले विभिन्न उत्पादों के लिए अंतर्राष्ट्रीय रूप से नयी पहचान दी है ताकि वहां के कलाकारों एवं उद्यमियों को पहचान मिल सके और अपनी कला को स्वरोजगार का रूप देकर वो अपनी आय में बढ़ोतरी कर सकें.

लेकिन क्या आपने सोचा है कि केले के रेशों से सस्ता एवं सुरक्षित सेनिटरी पैड भी बनाया जा सकता है ?

केरल के कोल्लम  की रहने वाली अंजू बिष्ट को नीति आयोग ने वुमन ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया अवार्ड्स से सम्मानित किया है. यह अवार्ड उन महिलाओं को दिया जाता है, जो अलग-अलग क्षेत्रों में उल्लेखनीय काम करती हैं. अंजू बिष्ट, “अमृता सेरवी (Amrita SeRVe)”  नाम की एक संस्था चलाती हैं. यह संस्था पुन: प्रयोग या सौख्यम पुन: प्रयोज्य  पैड (Saukhyam Reusable Pad) का निर्माण करती है. जी हां, अंजू और उनकी टीम महावारी के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले ऐसे पैड का निर्माण करती हैं, जिसे फिर से उपयोग किया जा सकता है.

यह पढ़कर आपको जरूर हैरानी हो रही होगी कि आखिर कैसे केले के पेड़ के फाइबर से पैड का निर्माण किया जा सकता है, वो भी उच्च गुणवत्ता वाले पैड. द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक यह अपनी तरह का पहला पैड है, जिसका निर्माण इसतरह किया जाता है. इसके पीछे का उद्देश्य एक ही है कि भारत की ग्रामीण महिलाओं को सस्ती कीमत पर पैड उपलब्ध कराया जाए.

अब तक, अमृता सेरवी ने 5 लाख से अधिक पैड बेचे और वितरित किए हैं, जिससे सालाना 2,000 टन से अधिक CO2 के उत्सर्जन को रोकने में मदद मिली है. इससे अनुमानित 43,750 टन गैर-बायोडिग्रेडेबल मासिक धर्म अपशिष्ट को खत्म करने में भी मदद मिली है.

अमृता सेरवी हर जगह महिलाओं और लड़कियों को केले के रेशे से बने उच्च गुणवत्ता वाले किफायती मासिक धर्म पैड उपलब्ध करा रही है. अंजू बिष्ट को भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने का व्यापक अनुभव है. जब माता अमृतानंदमयी मठ ने 2013 में गांवों को गोद लिया था, तो वह उस टीम का हिस्सा थीं, जिसने भारत के 21 राज्यों में सबसे पिछड़े गांव समूहों की यात्रा की, इन गांवों के सतत विकास के लिए पहल शुरू करने में मदद की.

सौख्यम पुन: प्रयोज्य पैड ने कई पुरस्कार जीते हैं. देश ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह  पैड बेचे जाते हैं. आज तो इसकी ऑनलाइन बिक्री होती है और साथ ही यूके, जर्मनी, यूएसए, कुवैत और स्पेन जैसे देशों में निर्यात किए जाते हैं. टीम का दृष्टिकोण है कि निर्यात किया जाने वाला वही उच्च गुणवत्ता वाला पैड दूरस्थ, ग्रामीण समुदायों में सस्ती कीमतों पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए.

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