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सपा गठबंधन में खुलने लग गयीं, गठबंधन कि गाठें

यूपी के नेता प्रतिपक्ष अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव कल मंगलवार को अखिलेश यादव कि मीटिंग में नहीं पहुंचे। बुधवार को विधानसभा में शिवपाल शपथ लेने गए तो इस पर उठे सवाल पर बोले ‘वक्त आने पर फैसला लेंगे।’ अपना दल ‘कमेरावादी’ के साथ भी असहज रिश्तों की चर्चाएं हैं। एक सहयोगी दल के दूसरी जगह संभावनाएं तलाशने के कयास हैं। ऐसे में नेता प्रतिपक्ष के सामने फिलहाल अपनों के ही ‘विपक्ष’ की चुनौती गहरा रही है। खासकर जून-जुलाई में प्रस्तावित विधान परिषद व राज्यसभा के चुनाव में ही विधायकों की ‘निष्ठा’ की परीक्षा होनी है।

सपा मुखिया अखिलेश यादव पार्टी की उम्मीदों को बचाने और हौसले को उड़ान देने के लिए लोकसभा छोड़कर पहली बार विधानसभा में डटे हैं। फिर भी उन पर अपना नेतृत्व साबित करने और उस पर भरोसा बनाए रखवाने की चुनौती है। अखिलेश यादव की अगुआई में सपा अब तक चार अहम चुनाव लड़ चुकी है, लेकिन हर बार प्रयोग व नतीजे निराश करने वाले रहे हैं।

2014 के लोकसभा चुनाव में सपा 5 सीटें जीत सकी। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन के बाद भी सपा की सीटें 50 से नीचे रहीं। 2019 में बसपा के साथ हाथ मिलाने के बाद भी अखिलेश यादव सपा को पांच सीटों से आगे नहीं बढ़ा पाए। 2022 में परिवर्तन के तमाम दावों, सेंधमारी व नए साथियों को जोड़ने के बाद सत्ता से लंबी दूरी बनी रही। नतीजों के बाद भीतर-बाहर दोनों ओर से सवाल तेज और कठिन हैं।

गठबंधन की खुल रही गांठें

सत्ता में वापसी के लिए गठबंधन के प्रयोग अखिलेश पर भारी ही पड़े हैं। वहीं टूटने के बाद उठने वाले सवाल भी जमीन दरकाते रहे हैं। 2019 में बसपा के साथ गठबंधन करने के लिए अखिलेश मायावती की हर शर्त मानते रहे। चुनाव के बाद सपा जस की तस रही और बसपा शून्य से दस पहुंच गई। फिर भी बसपा से गठबंधन तोड़ा और असफलता का सारा ठीकरा सपा पर फोड़ा।

2022 में आधा दर्जन से अधिक छोटे दलों के साथ और भाजपा के कई चेहरों का हाथ पकड़ने के बाद भी चुनाव के पहले और चुनाव के बाद भी समायोजन व संवाद की चुनौती बनी हुई है। शिवपाल अपनी पार्टी के खाते में एक सीट जाने से असहज थे। अपना दल (कमेरावादी) टिकट वितरण को लेकर नाराज थी। चुनाव के दौरान भी सहयोगियों से अपनी बात न सुने जाने की शिकायतें की थीं। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को हराने के बाद पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष पल्लवी पटेल की उम्मीदें भी बढ़ी हुई हैं। महान दल के केशव देव मौर्य के सवाल कई बार सार्वजनिक हो चुके हैं। ऐसे में गठबंधन की खुलती ‘गांठों’ को कसे रखना आसान नहीं रह गया है।

जारी रहेगी कुरबानी ?

अखिलेश यादव ने चुनाव के पहले जब जीत का समीकरण बनाने के लिए भाजपा और बसपा से कई चेहरे जोड़े तो सपा के कई नेताओं-कार्यकर्ताओं का समीकरण बिगड़ गया। तब अखिलेश ने कार्यकर्ताओं को ‘त्याग’ की सीख दी थी। गठबंधन को जोड़े रखने के लिए यह ‘कुरबानी’ अभी जारी रखनी पड़ सकती है।

4 जुलाई को राज्यसभा की 11 सीटें खाली हो रही हैं। इसमें तीन सीटें सपा की हैं। सपा इस बार फिर तीन सीटें जीतने की स्थिति में रहेगी, लेकिन इसके लिए सहयोगियों का साथ जरूरी होगा। सूत्रों का कहना है एक सहयोगी दल के मुखिया राज्यसभा जाना चाहते हैं, ऐसे में सपा के खाते की एक सीट उनके पास जा सकती है। वहीं, चर्चा प्रसपा मुखिया शिवपाल यादव की भी नई संभावनाएं तलाशने की है।

दूसरी ओर 6 जुलाई को विधान परिषद की 13 सीटें खाली हो रही हैं। इसमें भी तीन से चार सीट पर सपा वापसी कर सकती है। एक सहयोगी दल के मुखिया अपने बेटे को परिषद पहुंचाना चाहते हैं, जो चुनाव हार गया था। इन ‘अपेक्षाओं’ को साधने पर ही साथ निर्भर करेगा। दोनों ही चुनाव में विधायक ही वोटर होते हैं। भाजपा ने अभी से सेंधमारी के लिए चेहरे चुनने शुरू कर दिए है। अखिलेश के चेहरे का इकबाल इन चुनावों में भी तय होगा।

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