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हौसले की उड़ान : पिता ने खेत गिरवी रखा, उधार के पैसे से बेटी को बनाया इंटरनेशनल लेवल का हॉकी प्लेयर

यह कहानी हॉकी की है. बात है इस खेल के खिलाड़ी की. झारखंड के सिमडेगा जिले की बेटी, ब्यूटी डुंगडुंग. खेतों में काम करने वाली लड़की आज राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी है. उसके पिता अम्ब्रोस डुंगडुंग भी हॉकी के नेशनल प्लेयर रह चुके हैं. बेटी के हाथों में हॉकी होगी, यह सपना पिता ने देखा था. बचपन में ही. सोच लिया था कि ब्यूटी हॉकी खेलेगी. मगर घर के हालात ऐसे न थे. गरीबी थी ही, कोरोनाकाल ने और तंग कर दिया था. मगर प्रतिभा छुपती थोड़े ही है. सिमडेगा की हॉकी कोच प्रतिमा बारवा की नजर पड़ गई. ब्यूटी के हाथों का जादू कोच को दिख गया. उन्होंने पिता से कहा. अम्ब्रोस को उनका सपना सच होता नजर आया. लेकिन हाथ तंग थे. फिर क्या करे?

कठिन समय में साथ देने आई पत्नी नीलिमा. माता-पिता ने फैसला ले लिया. ब्यूटी को हॉकी प्लेयर बनाने के लिए अम्ब्रोस ने खेत गिरवी रख दिए. कुछ उधारी पैसे भी उठाए. बेटी को सौंप दिया कोच के हाथों में. आज ब्यूटी भारतीय टीम का हिस्सा है. जूनियर महिला वर्ल्ड कप और कई नेशनल टूर्नामेंट में खेल चुकी है. हाल में उसकी नौकरी भी लग गई. ब्यूटी और उसके माता-पिता संघर्ष के दिनों को याद कर रो पड़ते हैं.

सपने साकार होते हैं, तो आंसू छुप नहीं पाते. कुछ ऐसा ही दिखा बाजुटोली गांव में. इंटरनेशनल हॉकी खिलाड़ी ब्यूटी डुंगडुंग का गांव है बाजुटोली. झारखंड के सिमडेगा के करंगागुड़ी में पड़ता है. ब्यूटी की जिंदगी बदल गई है. मगर उसका घर चकाचौंध से दूर है. गांव में मिट्टी या खपड़ैल घर इसका प्रमाण है. एकबारगी यकीन नहीं होगा कि इस दुर्गम स्थान से यह प्रतिभा, शहर तक कैसे पहुंची.

अम्ब्रोस डुंगडुंग का घर भी इन्हीं खपड़ैल घरों में से एक है. वे कहते हैं- आर्थिक तंगी बड़ी बाधा थी. 4 बच्चों वाला परिवार है. ब्यूटी को कायदे की ट्रेनिंग दिलाना बड़ी चुनौती थी. लेकिन जानता था कि वह नाम रौशन करेगी. इसलिए मैं और मेरी पत्नी ने फैसला कर लिया. जैसे भी हो, ब्यूटी को ट्रेनिंग दिलाएंगे. बेटी हमारी उम्मीदों पर खरी उतरी.


अम्ब्रोस कहते हैं, वह राष्ट्रीय स्तर पर हॉकी खेल चुके हैं. हुनर ऐसा कि कई संस्थानों ने कोच बनने का ऑफर भी दिया. लेकिन पत्नी बीमार है. इसलिए घर छोड़ना मुमकिन नहीं था. एक बेटा आर्मी में है. वह अपने परिवार के साथ रहता है. उससे कोई मदद माता-पिता को नहीं मिलती. ब्यूटी हॉकी खेलती है. उसे स्टाइपेंड मिलता है. जब कभी घर आती तो कुछ मदद मिल जाती थी.

अम्ब्रोश कहते हैं कि ब्यूटी का एक भाई सचिन भी हॉकी खेलता है. वह भारतीय जूनियर टीम में है. अभी बेंगलुरु में ट्रेनिंग ले रहा है. एक घर पर रहता है. ब्यूटी को नेशनल लेवल के खेल की ट्रेनिंग दिलानी थी. यह आसान नहीं था. अम्ब्रोस ने बताया कि ब्यूटी की मां को पक्षाघात हुआ था. वे गांव में ही इलाज करवा रहे हैं. लेकिन बच्चों को आगे बढ़ने में पैसे की कमी महसूस नहीं होने देना चाहते थे.

अम्ब्रोस की तरह ही और भी अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे का नाम हो. माता-पिता के लिए इससे बड़ी खुशी कुछ नहीं. मगर यह श्रमसाध्य है. मंजिल आसानी से नहीं मिलती. ब्यूटी के साथ भी यही कहानी थी. माता-पिता चाहते थे कि बेटी इंटरनेशनल हॉकी खेले. देश-दुनिया में पहचान बनाए. मगर कैसे ?

अम्ब्रोस कहते हैं कि गांव में अपने बल-बूते उन्होंने सब कुछ हासिल किया है. मेहनत की, बंधक रखा खेत छुड़वाया. फसल के दाम आने लगे, तो गृहस्थी चलने लगी. लेकिन ब्यूटी के लिए इतना पर्याप्त नहीं था. उसे बेहतर ट्रेनिंग दिलानी थी. और पैसे चाहिए थे. इसलिए अम्ब्रोस मुंबई गए. वहां मजदूरी की. वे कहते हैं- कोरोनाकाल में लॉकडाउन था. सब कुछ बंद. ब्यूटी घर पर रहकर ही प्रैक्टिस करती थी. बचा समय खेतों में काम भी करना होता था. लेकिन बेटी का हौसला न टूटा. पिता की लगन भी रंग लाई. और सीन में एंट्री हुई कोच प्रतिमा बारवा की.

इंटरनेशनल हॉकी खिलाड़ी ब्यूटी डुंगडुंग ने अपने खेल का लोहा मनवा लिया है. इंडियन ऑयल से खेल कोटे में उन्होंने नौकरी मिल गई है. इसके पीछे माता-पिता की सोच है. मगर माता-पिता, पूरा श्रेय कोच प्रतिमा बारवा को देते हैं.

ब्यूटी की मां नीलिमा ने कहा कि प्रतिमा जी ब्यूटी की दूसरी मां हैं. प्रतिमा बारवा सिमडेगा में एसएस बालिका एस्ट्रोटर्फ हॉकी ट्रेनिंग सेंटर की कोच हैं. न्यूज 18 के साथ बातचीत में अम्ब्रोस कहते हैं- ब्यूटी का सबसे पहले सेलेक्शन लचडागढ़ डे बोर्डिंग में हुआ था. वहीं प्रतिमा बारवा की नजर उस पर पड़ी. वह उसे अपने डे बोर्डिंग में लेकर आईं. ब्यूटी को न सिर्फ अच्छा गुरु मिला, बल्कि घर से दूर ‘मां’ भी मिली. अम्ब्रोस ने कहा- वह मां जैसी हैं. खेल की कमी सुधारती हैं. कुछ भी जरूरत हो, तुरंत मदद करती हैं.

ब्यूटी डुंगडुंग जिस ‘बगिया’ से निकलीं है, उसकी माली प्रतिमा बारवा हैं. एसएस बालिका एस्ट्रोटर्फ हॉकी ट्रेनिंग सेंटर की अस्थाई कोच. साल 2008 से वह इस सेंटर में अपनी सेवाएं दे रही हैं. उन्हें वेतन नहीं मिलता. पद भी परमानेंट नहीं. मेहनत के बदले मानदेय देती है सरकार. लेकिन सलीमा, संगीता, सुषमा और ब्यूटी जैसी कई खिलाड़ियों की वह अकेली प्रेरणास्रोत हैं.

प्रतिमा कहती हैं कि झारखंड की पहली महिला खिलाड़ी है ब्यूटी, जिसे खेल के दम पर नौकरी मिली है. इंडियन ऑयल कंपनी ने उसे नौकरी दी है. प्रतिमा के मुताबिक आने वाला समय ब्यूटी का है. उसमें हॉकी के प्रति लगन है. मेहनत करने का जज्बा. वह निश्चित रूप से आगे जाएगी. आज जूनियर टीम में नाम कमाया है. कल इंटरनेशनल लेवल पर सीनियर टीम में खेलेगी. आने वाला समय ब्यूटी का है.

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