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अहंकारी नितीश कुमार के लिए विभीषण साबित हो सकते हैं RCP सिंह

बिहार में जदयू के दिग्गज नेता कहे जाने वाले RCP सिंह ने काफी प्रयास किया कि वो नितीश कुमार के साथ जो रिश्ते में उलझन पैदा हुयी है उसे सुलझा लें … लेकिन कटु सत्य तो ये है कि “चापलूसी प्रिय” के नाम से मशहूर नितीश कुमार ललन सिंह जैसे ऐसे चाटुकारों से घिरे पड़े हैं, जो उन्हें सियासी परिदृश्य के पीछे की सच्चाई को देखने ही नहीं दे रहे.

RCP सिंह को बीजेपी ने राज्यसभा से सांसद बनाया, मोदी-सरकार में केन्द्रीय मंत्री बनाया. हाल ही में जब RCP की सदस्यता खत्म हुयी तो नितीश कुमार ने अपने चाटुकारों की बातों में आकर RCP को बीजेपी का दलाल का नाम दे दिया और फिर से राज्यसभा के टिकट से RCP को वंचित कर दिया. RCP सिंह बिहार वापस लौटे, ये सोचा की पार्टी में फिर से उनके कद को देखते हुए पद मिल जाएगा, लेकिन नितीश के चाटुकारों ने ये भी होने नहीं दिया. उल्टे RCP पर कई तरह के आरोपों वाले बयानों का जहर उगलते रहे और RCP, पार्टी के भावना को सम्मान देते हुए उस जहर को निगलते रहे.

लेकिन जब RCP के लिए इस तरह की दुर्भावना, उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने लगी तो कल 06 अगस्त 2022 को RCP ने इस्तीफा दे दिया. अब बिहार में नितीश कुमार के तख्ता पलट की पृष्ठभूमि भी कल से तैयार होने लगी है, जो आने वाले समय में नितीश कुमार को उसी तरह सियासी फूटपाथ पर बिठाती हुयी दिखेगी, जिस तरह से साजिश के तहत अपने सियासी गुरुओं जॉर्ज फर्नांडिस और शरद यादव को नितीश कुमार ने सियासी फूटपाथ पर बिठा दिया था.

बिहार में केवल RCP ही नहीं बल्कि बीजेपी के खिलाफ भी लगातार जहर उगलते रहे हैं नितीश कुमार के चाटुकार. यह इस बात को साबित करता है कि जदयू, गठबंधन में रहते हुए मलाई भी चाटना चाहती है और गठबंधन धर्म का पालन भी नहीं करना चाहती. जदयू के चाटुकारों को ये भरोसा हो गया है कि मुस्लिम तुष्टिकरण कर के वो आने वाले समय में सत्तासीन ही दिखेंगे और नितीश कुमार “सदाबहार मुख्यमंत्री” बने रहेंगे. एक तरह से बिहार में अब बीजेपी को सियासी तौर पर ब्लैकमेल करने लगी है जदयू. इस बता को बीजेपी आला कमान ने गंभीरता से लिया है और आगे का खेल्ला जो बीजेपी खेलने वाली है वो खेल्ला, जदयू के लिए खतरनाक साबित हो सकता है.

ये खेल्ला जदयू के लिए कैसे खतरनाक साबित हो सकत है ? जदयू के साथ RCP और BJP, कौन सा खेल्ला खेलने की तैयारी में हैं ? … इन दो सवालों का जवाब RCP के साथ जदयू के चाटुकारों और स्वयं नितीश कुमार के व्यवहार में दिखता है. RCP के त्यागपत्र में दिखता है. NDA में रहते हुए जदयू के नेताओं का बीजेपी के खिलाफ बयानबाजी में दिखता है, बीजेपी के नीतियों के विरोध में दिखता है.

जदयू के नेताओं का बीजेपी के खिलाफ बयानबाजी और नितीश कुमार के द्वारा ऐसे नेताओं के खिलाफ कार्यवाही न कर, उन्हें प्रोत्साहित करने की साजिश … ये दोनों बातें अब बीजेपी आला-कमान के लिए बर्दाश्त से बाहर होती हुयी तो दिख ही रही हैं.

कहते हैं कि “कांटे को निकालने के लिए कांटे का उपयोग करना जरुरी होता है” …. कुछ इसी तरह के फार्मूले पर काम करती हुयी दिख सकती है बीजेपी … इस फार्मूले से बीजेपी एक तीर से दो निशाने साधती हुयी दिख सकती है … पहला निशाना तो ये कि अहंकारी नितीश कुमार को सियासी फूटपाथ पर बिठाने का काम पूरा हो सकता है … दूसरा ये कि 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए बिहार में बीजेपी की जमीन बेहतर की जा सकती है … ऐसा इसलिए क्योंकि बीजेपी नहीं चाहती कि अब NDA में जदयू को ज्यादा मजबूत बनाए रखा जाए. इसके लिए जरुरी है कि जिस तरह बीजेपी ने LJP के साथ मिलकर पिछले विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर जदयू को धराशायी करवाते हुए 2020 के विधानसभा चुनाव में 43 सीटों पर समेटवा दिया, जबकि 2015 के चुनाव में इसी जदयू को 71 सीटें मिली थीं …. अब बीजेपी चाहती है कि आगामी लोकसभा चुनाव में भी जदयू की हालत कमजोर साबित हो जाए और बीजेपी पुरे मजबूती के साथ उभरे.

“कांटे को निकालने के लिए कांटे का उपयोग” … इस फार्मूले पर काम करने के लिए बीजेपी एक गहरी चाल चलती हुयी दिख सकती है जो बिहार के सियासत में बड़ा खेल्ला कहा जा सकता है … इस फार्मूले के लिए बीजेपी वो खेल्ला खेलती हुयी दिख सकती है, जिसके बारे में बड़े-बड़े रणनीतिकार भी भौंचक्क रह जाएं …. बीजेपी के समर्थन से बनी हुयी नितीश कुमार की सरकार को गिराने के लिए, NDA अब बहाना ढूंढ रही है ताकि वो नितीश सरकार से अपना समर्थन वापस खिंच ले और नितीश कुमार की सरकार धड़ाम से गिरती हुई नजर आए.

अब ऐसे में सवाल ये उठता है कि “अगर ऐसी स्थिति बनी तो नितीश कुमार के द्वारा खुद को CM बनाए रखने के लिए राजद का दामन थामा जा सकता है” …. इस तरह के सवाल की गुंजायश ही बीजेपी छोड़ना नहीं चाहती …. ये ऐसी साजिश होगी जिसके क्रियान्वयन में जीतनराम मांझी जैसे कई घटक दलों को राजद को समर्थन देने के लिए कहा जा सकता है ताकि बिना जदयू के समर्थन के राजद बहुमत का आंकड़ा साबित कर सके. वैसे राजद के पास बहुमत के लिए ज्यादा बड़े आंकड़े की जरूरत भी नहीं है. राजद को बहुमत साबित करने के लिए 122 का आंकड़ा छूना है जबकि राजद के पास पहले से ही महागठबंधन का 110 का आंकड़ा है, जिसमें AIMIM के 5 में से 4 विधायक भी राजद में शामिल हो जाने से ये आंकड़ा फिलवक्त 114 का है यानि राजद बहुमत से लगभग 8 सीटों की दुरी पर है. संभव है कि जदयू के कुछ विधायकों के साथ RCP अपना समर्थन राजद को दे दें.

अब कुछ लोग ये सवाल करेंगे की बिहार में राजद का सरकार अगर बन जाती है तो बीजेपी को क्या फायदा होगा ? ये सवाल अहम् है लेकिन जटिल नहीं क्योंकि बिहार में राजद के द्वारा सत्ता में आने के लिए काफी उछल-कूद किया जा रहा है. बिहार के यादवों और राजद समर्थकों को ये महसूस हो रहा है कि अगर तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बने तो बिहार की तस्वीर ही बदल देंगे, बिहार तरक्की करता हुआ दिखेगा … लेकिन ऐसा सोचने वाले लोगों को ये भी सोचना चाहिए कि बिहार में जब लालू यादव जैसे अनुभवी नेता, यादवों को नहीं सम्भाल पाए तो क्या तेजस्वी संभाल पायेंगे ? ऐसा सवाल इसलिए क्योंकि लालू यादव को डुबोने वाले लालू यादव के वो समर्थक ही थे जो बेलगाम होकर बिहार को जंगलराज में तब्दील करते हुए दिखे थे. बिहार में “अपहरण” को उद्योग कहा जाने लगा था. ह्त्या, लूट और रंगदारी का बाजार गर्म था. जब तेजस्वी यादव सत्तासीन होंगे तो यादवों के साथ-साथ मुसलमानों का भी तेवर चढ़ता हुआ नजर आयेगा. वैसे भी बिहार में PFI ने अपनी जड़ों को साबित कर ही दिया है तो तेजस्वी यादव के राज में आतंकवाद भी फलता-फूलता हुआ नजर आएगा.

“कांटे को निकालने के लिए कांटे का उपयोग” … यह फार्मूला लगाकर बीजेपी, तेजस्वी यादव की सियासी क्षमता और कौशल का काला-चिट्ठा बिहार में खोल देगी … जंगलराज और आतंकवाद से घिरा हुआ बिहार, मात्र दो साल में ही त्रस्त होता हुआ दिखेगा. संभव है कि बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाने जैसी स्थिति बनती हुयी भी दिखे … अगर नहीं भी दिखी तो 2024 के लोकसभा चुनाव में बिहार की त्रस्त जनता, राहत के लिए राजद को आहत करती हुयी दिखेगी … फिर 2025 के चुनाव में बिहार में राजद की स्थिति बर्बादी के कगार पर खड़ी हुयी दिखेगी.

“कांटे को निकालने के लिए कांटे का उपयोग” … बीजेपी के इस फार्मूला में केवल बिहार में RCP के मार्फत नितीश कुमार के बर्बादी की ही कहानी नहीं रची जाएगी … तेजस्वी के सरकार को बर्बाद करने में लालू के बड़े सुपुत्र तेजप्रताप यादव का भी प्रेरित किया जा सकता है … वैसे भी तेजप्रताप यादव, खुद ही कई बार तेजस्वी के विरोध में बयानबाजी करते हुए दिखे हैं, राजद संगठन के नेताओं का विरोध करते हुए दिखे हैं … ऐसे में RCP और तेजप्रताप यादव जैसे कांटे को अगर बीजेपी, नितीश कुमार और तेजस्वी यादव जैसे काँटों को निकालने के लिए उपयोग करती हुयी दिख जाए तो “किम आश्चर्यम ?”

इन्तजार कीजिये, महाराष्ट्र के सियासत के बड़ा, बिहार की सियासत में बहुत कुछ होता हुआ दिख सकता है.

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